त्याग,तप और राष्ट्र आराधना का शताब्दी पर्व!जिसकी ज्योति राष्ट्रदीप बनकर संपूर्ण भारत को आलोकित कर रही है.
जिनकी आस्था सनातन भारतीय मूल्यों में दृढ़ हो,जो मां भारती के आराधक हों,जिनके जीवन का लक्ष्य राष्ट्रसेवा हो! जो यह उद्घोष कर सकें! ‘राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम.
भारत को विश्वगुरु बनने और मां भारती के परम वैभव को शिखर तक पहुंचने से कोई शक्ति रोक नहीं सकती, हमे आत्मनिर्भर अखण्ड भारत के निर्माण के लिए और स्वावलंबी बनना होगा.
प्रजातांत्रिक मार्गों से ही समाज में परिवर्तन आ सकता है,कोई भी राष्ट्र अलगाववाद से नहीं जी सकता
संपादकीय: जर्नलिस्ट विजय कुमार मिश्र-
भारत की पावन भूमि आदिकाल से ही त्याग,तप और धर्म का अखंड स्रोत रही है। इस पावन धरा के पर्वतों में ऋषियों मुनियों की साधना संचित है,नदियों में वेदों की ऋचाएं प्रवाहित होती हैं और वायु में सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश गूंजता है,सौ वर्षों की तपश्चर्या,सेवा और त्याग ने जिस दीपशिखा को अखंड रखा,आज उसकी ज्योति और प्रखर होकर भविष्य को आलोकित कर रही है! इतिहास साक्षी है कि जब-जब इस पुण्यभूमि पर संकट का अंधकार छाया, तब-तब कोई ज्योति प्रज्वलित होकर जनमानस को जाग्रत करती रही! बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भी ऐसा ही समय था,एक ओर पराधीनता की बेड़ियों ने राष्ट्र को अवसाद में डाला हुआ था, दूसरी ओर विभाजनकारी प्रवृत्तियां सांस्कृतिक दिग्भ्रमित समाज को दिशाहीन बना रहे थे!राष्ट्र जीवन कराह रहा था और जनमानस भ्रमित होकर निःसहाय प्रतीत होता था! ऐसे ही विषम समय में विजय दशमी के पावन पर्व पर, सन् 1925 में नागपुर की पुण्यभूमि पर डा. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने राष्ट्र जागरण का एक दीप प्रज्ज्वलित किया! एक शताब्दी पूर्व प्रज्ज्वलित वह छोटी-सी ज्योति आज विश्व के सबसे बड़े स्वयंसेवी सांस्कृतिक संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के रूप में अखंड राष्ट्रदीप बनकर संपूर्ण भारत को आलोकित कर रही है!
“राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” का जन्म किसी राजनीतिक महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि भारतीय जनमानस की पुकार के रूप में हुआ है! डा. हेडगेवार ने अनुभव किया कि स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी,जब समाज अंदर से दृढ़, संगठित और चरित्रवान बनेगा!उन्होंने संकल्प लिया कि ऐसे नागरिक तैयार किए जाएं, जिनकी आस्था सनातन भारतीय मूल्यों में दृढ़ हो,जो मां भारती के आराधक हों और जिनके जीवन का लक्ष्य राष्ट्रसेवा हो! जो यह उद्घोष कर सकें! ‘राष्ट्राय स्वाहा, इदं राष्ट्राय इदं न मम ।।
“राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” की शाखा इसीलिए मात्र खेलकूद अथवा व्यायाम का स्थान नहीं है, अपितु चरित्र निर्माण की कार्यशाला है। यहां सेवा और समर्पण का संस्कार बोया जाता है। भगवा ध्वज के समक्ष ‘नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे’ का समवेत गान प्रत्येक स्वयंसेवक के अंतःकरण में यह संकल्प दृढ़ कर देता है कि उसका जीवन किसी स्वार्थ का साधन नहीं, अपितु राष्ट्र के लिए समर्पित एक साधना है।
आरएसएस (संघ) के सौ वर्ष संगठन विस्तार से बढ़कर अनुशासित शाखाओं, निरंतर सेवाभाव और राष्ट्रनिष्ठ नागरिक निर्माण की साधना का प्रमाण हैं। आज 51,000 से अधिक स्थानों पर 83,000 शाखाएं और 1,29,000 से अधिक सेवा प्रकल्प शिक्षा, स्वास्थ्य, आत्मनिर्भरता, ग्रामोदय और आपदा राहत में सक्रिय हैं,शिक्षा के क्षेत्र में नानाजी देशमुख द्वारा स्थापित सरस्वती शिशु मंदिर आज भारतीय स्वयं सेवक संघ की शाखा मात्र या खेलकूद अथवा व्यायाम का स्थान नहीं है, अपितु चरित्र निर्माण की कार्यशाला है, यहां सेवा और समर्पण के अतिरिक्त संस्कार का बीज बोया जाता है, आधुनिक शिक्षा के सबसे बड़े केंद्र हैं! संघ कोई मात्र संगठन नहीं है,बल्कि भारत की आंतरिक शक्ति और जीवंत चेतना का प्रतीक हैं,स्वतंत्रता के पश्चात जब राजनीति ने सत्ता की होड़ और व्यक्तिगत स्वार्थों की ओर झुकना आरंभ किया, तब समाज के भीतर निराशा और विखंडन की आशंका उत्पन्न हुई,उस काल में भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने संगठन और सेवाभाव से राष्ट्र को नई ऊर्जा और सकारात्मक दिशा दी!
सन् 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राष्ट्र की सेवा के लिए अग्रसर हुए,उन्होंने सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों के लिए राहत शिविर, चिकित्सा सहायता और आपूर्ति व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया! आमजनमानस के मनोबल को बनाए रखने और आपात परिस्थितियों में अनुशासन बनाए रखने में स्वयं सेवक हमेशा अग्रणी भूमिका रहे! प्राकृतिक आपदाओं के समय भी संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले मदद के लिए पहुंचते हैं! श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति महायज्ञ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रेरक मार्गदर्शन अविस्मरणीय है! यह केवल मात्र एक आंदोलन नहीं था, बल्कि सनातन आस्थावानों की कई वर्षो की प्रतीक्षा का परिपूर्ण समापन था।
राष्ट्रीय सेवक संघ की शताब्दी यात्रा मार्ग में डा.हेडगेवार के बाद अनेक महान विभूतियों ने सरसंघचालक के रूप में संगठन को वैचारिक दृढ़ता और समाज सेवा के उच्च आदर्शों से संवाराने का कार्य किया! इसी क्रम में पूज्य माधवराव सदाशिव गोलवलकर ‘गुरुजी’ ने संघ को दार्शनिक आधार दिया और स्पष्ट किया कि भारत की पहचान केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि उसकी कई वर्षो की प्राचीन सनातन संस्कृति से है! आदरणीय बालासाहेब देवरसजी ने संघ को समाज जीवन के निकट लाकर सामाजिक समरसता के मार्ग को प्रशस्त किया! ऋषितुल्य प्रो. रज्जू भैया ने शिक्षा जगत में राष्ट्रीय चेतना का बीज बोया। माननीय सुदर्शनजी ने आधुनिक विज्ञान,तकनीक और विकास के क्षेत्र में संघ को सजग किया तथा भारतीय जीवन दर्शन और संस्कृति को वैश्विक संदर्भ के रूप में प्रस्तुत किया।
डा. हेडगेवार के विचार-दर्शन और आदर्शों को आगे बढ़ाते हुए, संघ ने राष्ट्र को ऐसे ऐसे नेतृत्व दिए जिन्होंने देश की राजनीति और प्रशासन को नई दिशा दी! पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का एकात्म मानव दर्शन मूल्य आधारित नेतृत्व का आदर्श है। पूर्व प्रधानमंत्री भारतरत्न श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयीजी के दूरदर्शी नेतृत्व ने भारत को विश्व के सामने परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित किया! आज पीएम नरेन्द्र मोदी आजादी के अमृतकाल के सारथी के रूप में भारत को नई दिशा दे रहे हैं!मौजूदा सरसंघचालक परम-आदरणीय डा. मोहन भागवतजी के नेतृत्व में आरएसएस आज नई ऊंचाइयों को छू रहा है!
आरएसएस की सौ वर्षों की तपश्चर्या, सेवा और त्याग ने जिस दीपशिखा को अखंड रखा, उसकी ज्योति आज और प्रखर होकर भविष्य को आलोकित कर रही है! शताब्दी वर्ष के लिए संघ का रोडमैप भी इसी दिशा में अग्रसर है,संघ ने ‘पंच परिवर्तन’ का आह्वान किया है,सामाजिक समरसता,जिससे समाज जाति, भाषा और क्षेत्रीय भेदों से ऊपर उठे,पर्यावरण संरक्षण,जो भारतीय दृष्टि से प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करे,स्वदेशी आधारित जीवनशैली, जो आत्मनिर्भर भारत का मार्ग प्रशस्त करे!नागरिक कर्तव्य-बोध, जिससे प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्रहित को अपनी दिनचर्या का अभिन्न अंग बनाए, इतिहास हमारी प्रेरणा का स्रोत है। प्रत्येक भारतवासी अपने भीतर संघ के संस्कारों का दीप प्रज्ज्वलित करे तो कोई भी ताकत भारत को विश्वगुरु बनने और मां भारती के परम वैभव को शिखर तक पहुंचने से कोई शक्ति रोक नहीं सकती! वंदे मातरम,भारत माता की जय।

