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जनजातीय भागीदारी उत्सव का भव्य समापन! विविध लोककला,नृत्य और परंपराओं ने रचा अनुपम संगम

उत्तर प्रदेश,लखनऊ: 18 नवंबर 2025

जनजातीय भागीदारी उत्सव का भव्य समापन! विविध लोककला,नृत्य और परंपराओं ने रचा अनुपम संगम

देशभर से आए कलाकारों ने प्रस्तुत की चित्रकूट से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक की सांस्कृतिक विरासत

लखनऊ: 18 नवंबर 2025, जनजाति भागीदारी उत्सव का मंगलवार को ऐतिहासिक और रंगारंग समापन हुआ। देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों, संगीत-परंपराओं और लोकनृत्यों ने इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान को एक जीवंत सांस्कृतिक केन्द्र में बदल दिया। दर्शकों की भारी उपस्थिति इस उत्सव के प्रति बढ़ते जन-रुचि को दर्शाती रही।

समाज कल्याण राज्य मंत्री संजीव गोंड ने प्रदर्शनी और सांस्कृतिक मंच का अवलोकन किया। अरुणाचल प्रदेश से आए सांस्कृतिक दल के कलाकारों ने राज्यमंत्री संजीव गोंड को अपने पारंपरिक वस्त्र ‘खादा’ और ‘टांगों’ पहनाकर पूर्वाेत्तर की सम्मान-परंपरा का सुंदर परिचय कराया। राज्य मंत्री ने सभी कलाकारों की कला-संरक्षण की प्रतिबद्धता की सराहना की। उन्होंने कहा कि जनजाति समाज के उत्थान के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे उत्सव न केवल कला का उत्सव हैं, बल्कि यह हमारे समाज को विविधता में एकता की सीख भी देते हैं। उत्तराखंड के कलाकारों ने किया पारम्परिक नृत्य:उत्तराखंड के कलाकारों ने पहाड़ी संस्कृति से जुड़े पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किए। उनकी प्रस्तुति में पर्वतीय त्योहारों, सामुदायिक उत्सवों और प्रकृति के प्रति सुंदर समावेश दिखाई दिया।

चित्रकूट की पारंपरिक प्रस्तुति: ‘बुआ को नेग मांगने वाला लोकगीत और नृत्य:चित्रकूट से आए कलाकारों ने बुंदेलखंड की विशेष लोक परंपरा पर आधारित अनूठा गीत और नृत्य प्रस्तुत किया, जो घर में बच्चे के जन्म पर बुआ को नेग मांगने की रस्म का प्रतीक माना जाता है।

शिल्पकारों को किया गया सम्मानित: कार्यक्रम के बीच शिल्पकारों, जनजाति विकास विभाग,उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान और टी आर आई की टीम और लोक कलाकारों को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में शिव प्रसाद निदेशक जनजाति विकास, टीआरआई के संयुक्त निदेशक आनंद कुमार सिंह, उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान के निदेशक अतुल द्विवेदी, जनजाति विकास विभाग की उपनिदेशक डॉ प्रियंका वर्मा सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। उत्सव का यह समापन न केवल सांस्कृतिक विविधता का उत्सव था, बल्कि देश की जनजातीय परंपराओं का गौरवपूर्ण प्रदर्शन भी रहा।

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