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तराई क्षेत्र के सागर बनेंगे पर्यटन का हब,पहले चरण में 9.54 करोड़ से होगा कायाकल्प! रोजगार,पर्यटन व सिंचाई के बढ़ेंगे अवसर

तराई क्षेत्र के सागर बनेंगे पर्यटन का हब,पहले चरण में 9.54 करोड़ से होगा कायाकल्प! रोजगार,पर्यटन व सिंचाई के बढ़ेंगे अवसर

जल विरासत के संरक्षण से बढ़ेगी सिंचाई की सुविधा! पहले चरण में 6 जलाशयों का कायाकल्प कराएगा ड्रेनेजखंड सिद्धार्थनगर

गूगल फाइल फोटो।

सिद्धार्थनगर। तराई की खेती का आधार सिद्धार्थनगर की जल विरासत के संरक्षण की कवायद अब शुरू हो गई है। क्षेत्र के 10 सागरों को पर्यटन हब के रूप में विकसित किया जाएगा। पहले चरण में 9.54 करोड़ रुपये से छह जलाशयों का कायाकल्प किया जाएगा।बजहा, मझौली, सेमरा, मसई, सिसवा और मोती सागर जलाशयों की सिल्ट निकाली जाएगी। इससे निकलने वाली नहरों की मरम्मत की जाएगी, किनारों पर पर्यटन सुविधाएं विकसित की जाएंगी। नौका विहार का लुत्फ उठा सकेंगे घूमने के शौकीन, पाथ वे व वाँच-टॉवर बनाए जाएंगे। भारत-नेपाल के बीच महली सागर को लेकर तेज हुई कूटनीतिक गतिविधियों ने सिद्धार्थनगर की जल विरासत को चर्चा में ला दिया है। सिंचाई विभाग ने सागरों के पुनर्जीवन के साथ पर्यटन विकास की संयुक्त कार्ययोजना पर काम शुरू कर दिया है। सिंचाई विभाग का कहना है कि इससे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से इस परियोजना से करीब 1000 लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है।

ड्रेनेजखंड के अधिशाषी अभियंता ने कहा कि वर्षों से जमी गाद,(सिल्ट) सीमित बजट व अतिक्रमण से कुछ जलाशय भारत-नेपाल से जुड़े मुद्दों का समाधान किए बिना परियोजना को गति देना आसान नहीं होगा। इसके बावजूद प्रशासन और सिंचाई विभाग को उम्मीद है कि यह योजना तराई क्षेत्र के जल संसाधनों और पर्यटन दोनों के लिए मील का पत्थर साबित होगी। वर्षों से गाद जमा होने के कारण अधिकांश सागरों की जलधारण क्षमता पहले से घटकर आधे से भी कम रह गई है, जिसे पुनर्जीवित करने की योजना बनाई गई है।

ड्रेनेज खंड अधिशासी अभियंता ने बताया कि नेपाल सीमा से सटे वर्डपुर और शोहरतगढ़ क्षेत्र में फैले करीब 20 हजार हेक्टेयर क्षेत्र के 10 ऐतिहासिक सागर अंग्रेजों के शासनकाल में सिंचाई और जल संरक्षण के उद्देश्य से बनाए गए थे। इन सागरों से निकली करीब 243 किलोमीटर लंबी 40 नहरों के जरिए कभी 30 हजार हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि की सिंचाई होती थी। समय के साथ गाद भरने और नियमित सफाई नहीं होने से इनकी जलधारण क्षमता आधे से भी कम रह गई और सिंचाई का दायरा सिमटकर करीब 10 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया।

अधिशासी अभियंता ड्रेनेज खंड कृपाशंकर भारती, ने बताया कि पहले चरण में बदलेगी इन सागरों की सूरत! बजहा, मझौली (मसौली)मोती, सेमरा, मसई और सिसवा सागर की गाद (सिल्ट) निकालकर उनकी जलधारण क्षमता बढ़ाई जाएगी। इसके बाद यहां नौकायन (बोटिंग), पाथ-वे, वॉच टावर, बैठने की व्यवस्था और अन्य पर्यटक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।सागरों की सिल्ट सफाई एवं नहरों की मरम्मत के लिए कार्ययोजना तैयार कर शासन को भेजा जा रहा है। जिसकी स्वीकृति मिलने के बाद कार्य कराया जाएगा।श्रोत विज्ञप्ति।

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