महर्षि बाल्मिकी जयंती पर 07 अक्टूबर को पूरे प्रदेश में रहेगा सरकारी अवकाश-
पंचायत और विधानसभा चुनावों की आहट के बीच अब भाजपा ने विपक्ष के जातीय से जुड़े राजनीतिक काट के लिए नया पासा फेंका है
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातियों की गणित अब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हर निर्णय, हर प्रतीक और हर नीति के पीछे उसका गहरा असर देखा जा रहा है. पंचायत और विधानसभा चुनावों की आहट के बीच अब भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के जातीय से जुड़े राजनीतिक काट के लिए नया राजनीतिक पासा फेंका है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 27 सितंबर को श्रावस्ती में वाल्मीकि जयंती पर सार्वजनिक अवकाश बहाल करने की घोषणा कर दी थी। उसी क्रम में शासन ने 03अक्टूबर को आदेश जारी किया कि 07 अक्टूबर को पूरे प्रदेश में महर्षि वाल्मीकि जयंती पर सार्वजनिक अवकाश अवकाश रहेगा। इस दिन मंदिरों में रामायण पाठ और धार्मिक आयोजन होंगे. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब विपक्षी दल खासकर समाजवादी पार्टी (सपा) पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के साथ नई सामाजिक गोलबंदी की कोशिश में जुटे हैं।
मुख्यमंत्री योगी का यह कदम राजनीतिक रणनीति का स्पष्ट संकेत है कि पार्टी अपने परंपरागत वोटरों को साधने और दलित राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए अब प्रतीकात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर सक्रिय हो गई है.
वाल्मीकि जयंती पर अवकाश के पीछे की राजनीति: अपको बता दें कि पहले भी वाल्मीकि जयंती पर सरकारी अवकाश होता था, लेकिन 2017 में योगी सरकार बनने के बाद कई छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं. तर्क था कि राज्य को विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए काम के दिन बढ़ाने होंगे. हालांकि पिछले कुछ महीनों से वाल्मीकि समाज लगातार जयंती पर अवकाश बहाल करने की मांग कर रहा था. संभल, शाहजहांपुर, बरेली जैसे जिलों में ज्ञापन सौंपे गए,26 सितंबर को डॉ. आंबेडकर ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य डॉ. लालजी प्रसाद निर्मल ने एक प्रतिनिधिमंडल को लेकर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर बाल्मिकी जयंती पर सरकारी अवकाश की मांग दोहराई थी!
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने हमारी बात सुनी और तुरंत निर्णय लिया. यह केवल अवकाश नहीं, बल्कि वाल्मीकि समाज के सम्मान की स्वीकृति है. इस समाज ने हमेशा प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी पर भरोसा जताया है। “यह फैसला चुनावी नहीं, सांस्कृतिक है. वाल्मीकि समाज हमारी परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है. उन्हें सम्मान देना हमारी प्राथमिकता है.” हालांकि राजनीतिक विश्लेषक इसे पूरी तरह सांस्कृतिक नहीं मानते. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि “राजनीति में समय और प्रतीक दोनों महत्वपूर्ण होते हैं. योगी सरकार का यह कदम एक तीर से दो निशाने साधने जैसा है! एक ओर वाल्मीकि समाज को सम्मान देना और दूसरी ओर विपक्ष के जातीय गठजोड़ के समीकरण को धराशाई कर देना।
वाल्मीकि समाज का राजनीतिक वजन और वोटिंग पैटर्न! उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 फीसदी है, जिसमें वाल्मीकि समाज की हिस्सेदारी लगभग सवा दो करोड़ के आसपास मानी जाती है. पश्चिमी यूपी, बुंदेलखंड और मध्य यूपी के कई जिलों में यह समाज निर्णायक भूमिका में है. नगर निकायों, सफाई सेवाओं और सरकारी ठेकों से जुड़े कामों में यह वर्ग बड़ी संख्या में है, लेकिन पिछले दशक में इसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ी हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में वाल्मीकि समाज ने बसपा के बजाय बीजेपी की ओर रुख किया था.पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर बीजेपी को इस समाज का साथ मिला, जिससे उसे निर्णायक बढ़त मिली. वर्ष 2022 में जब योगी सरकार दोबारा सत्ता में लौटी, तो इस समाज से आने वाले अनूप प्रधान को खैर विधानसभा सीट से जीत के बाद मंत्री बनाया गया. अनूप प्रधान कहते हैं, “बीजेपी ने हमें पहचान दी है।
अपको बता दें कि इससे पहले उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति सिर्फ एक जाति या एक पार्टी तक सीमित था,लेकिन अब दलित वोटरों को साधने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां में होड़ लगी है।

