नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
श्री कृष्ण का जन्म एवं कंस वध से जुड़ी रोचक जानकारी
द्वापर युग में जब मथुरा के राजा उग्रसेन के अत्याचारी पुत्र कंस ने अपने ही पिता को बंदी बनाकर राजगद्दी छीन ली, तब उसका आतंक चरम पर पहुंच गया। धर्म की रक्षा और कंस के पापों का अंत करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर अवतार लेने का निश्चय किया।कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत प्रेम करता था। जब देवकी का विवाह शूरसेन के पुत्र वासुदेव से हुआ, तो विदाई के समय आकाशवाणी गूंजी: “हे कंस! जिस देवकी को तू इतने स्नेह से विदा कर रहा है, उसी का आठवां पुत्र तेरा वध करेगा।”मृत्यु के भय से कांप उठे कंस ने तुरंत देवकी को मारने के लिए तलवार खींच ली। वासुदेव ने उसे शांत करते हुए वचन दिया कि वे अपनी हर संतान कंस को सौंप देंगे। कंस ने दोनों को प्राणदान तो दिया, लेकिन लोहे की सांकलों में जकड़कर मथुरा के घने कारागार में बंद कर दिया। पहरेदारों का कड़ा पहरा बिठा दिया गया।
एक-एक करके कंस ने देवकी के छह संतानों को जन्म लेते ही पत्थर पर पटककर मार डाला। सातवें गर्भ को योगमाया ने संकर्षण विधि से गोकुल में रह रहीं वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया, जिनसे बलराम जी का जन्म हुआ।भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की आधी रात, रोहिणी नक्षत्र और मूसलाधार बारिश के बीच मथुरा के कारागार में चमत्कार घटा। चारों ओर अलौकिक प्रकाश फैल गया और भगवान विष्णु अपने चतुर्भुज रूप में शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ प्रकट हुए। उन्होंने देवकी और वासुदेव को उनके पूर्व जन्मों की तपस्या का स्मरण कराया और आज्ञा दी कि वे उन्हें नवजात बालक के रूप में गोकुल में अपने मित्र नंदबाबा और यशोदा के घर छोड़ आएं, और वहां अभी-अभी जन्मी योगमाया (कन्या) को यहां ले आएं।
भगवान के आदेश पर जैसे ही वासुदेव ने शिशु को उठाया, चमत्कारिक रूप से कारागार के ताले अपने आप टूट गए, बेड़ियां खुल गईं और पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए। वासुदेव ने बालक कृष्ण को सूप में रखा और सिर पर उठाकर उफनती यमुना नदी की ओर चल पड़े। भयंकर गर्जना के साथ बारिश हो रही थी, तभी शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बालकृष्ण पर छत्र तान दिया। यमुना जी प्रभु के चरण स्पर्श करने के लिए उतावली हो उठीं; जैसे ही उनके चरण जल से छुए, नदी ने शांत होकर रास्ता दे दिया। वासुदेव बिना किसी बाधा के गोकुल में नंदबाबा के घर पहुंचे, जहां सभी योगमाया के प्रभाव से सो रहे थे। उन्होंने चुपचाप कृष्ण को यशोदा जी के पास सुला दिया और उनकी नवजात कन्या को उठाकर मथुरा कारागार लौट आए।
वासुदेव जैसे ही कारागार पहुंचे, लोहे के द्वार फिर से बंद हो गए और हथकड़ियां अपने आप बंध गईं। कन्या के रोने की आवाज सुनते ही पहरेदार जाग उठे और उन्होंने तुरंत कंस को आठवें बच्चे के जन्म की सूचना दी।
कंस काल की भांति कारागार पहुंचा और कन्या को छीनकर जैसे ही पत्थर पर पटकना चाहा, वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में उड़ गई। उसने अष्टभुजा देवी का विराट रूप धारण कर लिया और सिंहगर्जना करते हुए कहा: “मूर्ख कंस! मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? तुझे मारने वाला तो कब का गोकुल पहुंच चुका है!” यह कहकर देवी अंतर्ध्यान हो गईं।
उधर गोकुल में भोर होते ही नंदबाबा के घर लाला के जन्म का उत्सव छा गया। “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयकारों से पूरा ब्रज गूंज उठा। इस प्रकार अधर्म के अंधकार को चीरकर धर्म, प्रेम और आनंद की ज्योति बनकर भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य हुआ।
आपको सभी श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पावन शुभकामनाएं!


