सिद्धार्थ नगर-बर्डपुर दिनाँक-19-05-2021
(चन्द्रभान यादव रिपोर्टर सिद्धार्थनगर)
जैविक पद्धति से खेती कर समूह की दूसरी महिलाओं को भी कर रही हैं प्रेरित 
कृषि क्षेत्र में पहले की अपेक्षा अब बदलाव दिखने लगे हैं। अब महिलाएं भी अपनी सक्रीय भूमिका के द्वारा रसायनिक खेती को छोड़–जैविक खेती अपनाकर अच्छा मुनाफा कमा रही हैं। जबकि दूसरे किसान अधिक उत्पादन पाने के लिए अधिक से अधिक रसायन उर्वरकों का प्रयोग करते हैं। वहीं कुछ समूह की महिलाए जैविक तरीके से खेती कर अपनी नई पहचान बना रही हैं।
यूपी के जनपद सिद्धार्थ नगर के विकास खण्ड बर्डपुर अंतर्गत बर्डपुर न.7 परसपुर निवासी समूह सखी प्रमिला यादव जैविक खेती करती हैं जिसमें देसी टमाटर, बैंगन, भिंडी, मेथी, गाजर,मूली प्याज, करेला, लौकी, बोड़ा, पालक, साग,कददू जैसी सब्जियों की खेती करती है और बाकी में धान, गेहूं, उगाती हैं। उजाला आजीविका स्वयं सहायता समूह की महिलाएं खाद और कीटनाशक देशी गाय के गोबर से खुद तैयार करती हैं। जैविक खेती की शुरुआत के बारे में वे बताती हैं कि शून्य बजट प्राकृतिक खेती करते हैं जिसमें जीवामृत, घना मृत जैसे जैविक उर्वरक गाय के गोबर और गोमूत्र से बनती है। इसमें अलग से कोई खर्च नहीं करना पड़ता है।
समूह की महिलाओं ने कहा शासन स्तर से आर्थिक सहायता मिलेगी तो हम सभी (इंटीग्रेटेड फॉर्मिंग) एकीकृत खेती कर छेत्र की सभी महिलाओं को रोजगार भी मिलेगा इस संबंध में मुख्य बिकास अधिकारी को पहले भी पत्र के माध्यम से अवगत कराया गया है।
*प्रमिला यादव जैविक खेती पद्धति को अपनाकर खुद ही बेचती है हरी और ताजी सब्जियां*
उन्होंने बताया कि आजकल सभी जैविक तरीके से उगाए गए अनाज और सब्जियां खाना चाहते हैं। लोग जान रहे हैं रासायनिक उर्वरकों का खेतों में प्रयोग करने से तमाम तरह की बीमारियां भी हो रही हैं।
वहीं (पत्रकार) चन्द्र भान यादव ने
कहा कि लगभग 100 साल पहले खेती पूरी तरह जैविक खादों पर आधारित होती थी, इससे हमें शुद्ध साग-सब्जी, अन्न एवं फल-फूल प्राप्त होते थे, जिससे बीमारियां कम होती थी। उन्होंने कहा कि किसानों ने उपज बढ़ाने के लिए धीरे-धीरे फर्टिलाईजर एवं पेस्टीसाइड का प्रयोग करना शुरू कर दिया। इससे नए-नए रोगों ने भी अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। पहले लोग सिचाई और पीने के लिए कुओं का प्रयोग करते थे। उस समय पानी का अपव्यय नहीं होता था। नलकूप, पम्प सेट एवं समर सेबिल पम्प से पानी के अंधाधुंध दोहन के साथ उसका दुरपयोग भी शुरू हुआ। भूमि के अन्दर भी पानी का सीमित श्रोत है, अधिक दोहन के कारण जल स्तर काफी नीचे पहुंच चुका है। *चन्द्रभान यादव* (पत्रकार) ने कहा कि विकास की दौड़ में हम प्रकृति के साथ इंसाफ नहीं कर पाए। अधिक पैदावार की चाह में अन्धाधुंध फर्टिलाईजर का प्रयोग किया जा रहा है, इससे भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है। साथ ही मानव स्वास्थ्य पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। रोज नई-नई बीमारियां फैल रही हैं। इसके उपचार के लिए एलोपैथिक दवाओं एवं विटामिन के कैपसूल का प्रयोग किया जा रहा है। इससे शरीर में अन्य बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी घट रही है। उन्होंने किसानों से कहा कि मानव जाति की बेहतरी के लिए खेत में जैविक खाद का उपयोग करें।
(सिद्धार्थनगर से चंद्रभान यादव की रिपोर्ट..)
