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गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गौमाता को समर्पित..

गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गौमाता को समर्पित..

दीपावली के अगले दिन मनाया जाने वाला गोवर्धन पूजा का पर्व मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गौ माता को समर्पित है। हालांकि, यह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का दिन धार्मिक उपायों के लिए बेहद शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर इस दिन गोवर्धन पूजा के दिन कुछ विशेष सामग्री शिवलिंग पर अर्पित की जाए, तो भगवान शिव की कृपा से घर की दरिद्रता दूर होती है और धन-धान्य में वृद्धि होती है। इस साल गोवर्धन पूजा 22 अक्टूबर, दिन बुधवार को मनाई जाएगी।

गोवर्धन पूजा पर शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें: गोवर्धन पूजा के दिन सुबह स्नान के बाद शिवलिंग पर केसर मिश्रित दूध चढ़ाएं। शिवलिंग पर केसर चढ़ाने से विवाह से जुड़ी मुश्किलें दूर होती है। साथ ही घर में सुख-समृद्धि और धन का आगमन होता है।

शिवलिंग पर बिल्व पत्र अर्पित करते समय अपनी अनामिका से बिल्व पत्र पर चंदन या केसर लगाकर ‘ॐ नमः शिवाय’ लिखें। इसके बाद बिल्व पत्र को चिकने भाग की ओर से शिवलिंग पर चढ़ाएं। इस उपाय को करने से जीवन की मुश्किलें दूर होती है और भगवान शिव की कृपा से धन लाभ होता है।

गोवर्धन पूजा के दिन शिवलिंग पर शुद्ध देशी घी चढ़ाएं और उसके बाद जल से अभिषेक करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घी समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि शिवलिंग पर घी चढ़ाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है और घर में बरकत बनी रहती है।

अन्नकूट गोवर्धन पूजा को अन्नकूट उत्सव भी कहते है। इस दिन विभिन्न प्रकार की सब्जियों से खास भोग तैयार किया जाता है। गोवर्धन पूजा के दौरान अन्नकूट के भोग में से कुछ हरी सब्जिया और नया अनाज शिवलिंग के पास या किसी शिव मंदिर में दान करना चाहिए। माना जाता है कि इस उपाय को करने से अन्न-धन की कमी दूर होती है और भगवान शिव की कृपा मिलती है,शिवलिंग पूजा विधि के दौरान साधक को चाहिए कि स्नान के बाद साफ सुथरे कपड़े पहने, तत्पश्चात शिवलिंग पर जल चढ़ाकर अभिषेक करें। उसके बाद ‘ॐ नमो भगवते रूद्राय’ या ॐ त्रयंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम,उर्वारिक कमिव वंधनात मृत्युमुक्षीय मामृतात। ‘महामृत्युंजय मंत्र का 108 बार जाप करें! पूजा के दौरान तामसिक चीजों से दूर रहे।

गोवर्धन पूजा की कथा और वजह! पुराणों के अनुसार, बृजभूमि में स्थित गोवर्धन पर्वत पर एक अद्भुत घटना घटी थी। बृजवासी वर्षा ऋतु में भगवान इन्द्र देव की पूजा करते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि वर्षा वही भेजते है। पर बाल रूप में ही श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि गोवर्धन पर्वत, गाय, घास-चराई और वृन्दावन की भूमि यही उनकी असल संरक्षण की स्रोत है।

भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र की पूजा के स्थान पर पर्वत की पूजा करने के लिए कहा तो इन्द्र देव इससे रूष्ट हो गए और उन्होंने घोर वर्षा भेजी। तब कृष्ण ने अपनी एक उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और सात दिनों तक लोग, गाएं सभी बारिश से बचने के लिए उसी पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे। अंततः इन्द्र ने हार स्वीकार कर ली। इस घटना के बाद, उस दिन को पर्व के रूप में मनाने की परंपरा चली आ रही है।

गोवर्धन-पूजा और श्रीकृष्ण का संबंध: कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया, यह उनकी दिव्यता का प्रतीक है। पर्वत और कृष्ण का संबंध इतना गहरा है कि ब्रज-भूमि में गोवर्धन पर्वत को स्वयं कृष्ण का स्वरूप माना गया है। इस कथा के माध्यम से यह भी सिखने को मिलता है कि ‘भगवान’ सिर्फ मंदिर-दीवारों में नहीं, बल्कि प्रकृति के कण-कण में है। अतः इनका संरक्षण करें।

गोवर्धन पूजा की विधि: गोवर्धन पूजा में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। इस दिन अन्नकूट, कड़ी चावल आदि भोजन तैयार किया जाता है और भोग लगाया जाता है। साथ ही गाय-पूजा, चरागाह-सफाई, पर्वत-परिक्रमा जैसी प्राचीन रीतियाँ भी होती है।

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