गोरखनाथ: 05 सितंबर 2025
सत्य परमात्मा का स्वरूप,सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं-जगदगुरु स्वामी राम दिनेशाचार्यजी महराज
गोरखनाथ मंदिर में युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 56वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ की 11वीं पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का वाचन करते जगदगुरु रामानन्दाचार्य स्वामी राम दिनेशाचार्य जी महाराज।
गोरखपुर: ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ 56वीं और महंत अवेद्यनाथ की 11वीं पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह के अंतर्गत गोरखनाथ मंदिर में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन कथाव्यास राम दिनेशाचार्य ने सत्य के महत्व पर प्रकाश डाला। कहा कि सत्य परमात्मा का स्वरूप है।
कथाव्यास राम दिनेशाचार्य ने कहा कि सत्य के समान दूसरा कोई धर्म नहीं है और असत्य के समान कोई अधर्म नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म के चार चरण होते हैं। सत्य, तप, दया और दान। कथाव्यास ने कहा कि जबतक संसार की वासनाएं हमारे मन में रहेंगी, तब तक मन में ईश्वर का वास नहीं होगा। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध का पहला श्लोक ध्यान का, दूसरा गान का, तीसरा पान का है। ध्यान भगवान का करना चाहिए, श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का रसपान करते श्रद्धालु भक्त,उन्होंने कहा कि कथा रुपी अमृत रस का रसपान करना चाहिए।
भागवत कथा हमारे जीवन के अंधकार को समाप्त कर प्रकाशरूपी परमात्मा की प्रतिष्ठा कराती है। अहंकार को भक्ति का विरोधी बताते हुए कथाव्यास ने कहा कि भक्त के हृदय में अहंकार का अंकुर पैदा नहीं होना चाहिए। अहंकार भक्ति का विरोधी है। इसलिए मानव को भगवान के भक्तों की संगति करते रहनी चाहिए, जिससे अहंकार से बचे रहें। उन्होंने कहा कि भक्त होने की पहली शर्त है कि भक्ति में कोई शतं न हो। जो भक्ति किसी कारण से होती है, वह भक्ति नहीं होती।
कथाव्यास ने सलाह दी कि जब मर्यादित जीवन जीने का साहस आ जाए, तब राम की भक्ति करनी चाहिए। श्रीराम का चरित्र दिन के समान है तथा श्रीकृष्ण का चरित रात्रि के समान है। भगवान राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो श्रीकृष्ण सर्वेश्वर व योगेश्वर हैं।भजन सुनाकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
“सासों के हर सिरे पर तेरा नाम लिख दिया है, कहीं राम लिख दिया है कहीं श्याम लिख दिया है”

