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विदेशी आक्रमणकारी के नाम पर नामित सड़क का नाम “लखीशाह बंजारा” रोड रखा जाय- बृजलाल

दिल्ली – 05 अगस्त 2024

विदेशी आक्रमणकारी के नाम पर नामित सड़क का नाम “लखीशाह बंजारा” रोड रखा जाय- बृजलाल

दिल्ली। राज्य सभा सांसद बृजलाल ने आज सदन में प्रश्नकाल के दौरान कहा कि मुगल अक्रमणकारियो ने किस तरह गुरु तेगबहादुर सिंह व उनके परिवार को इस्लाम कुबूल करवाने के लिए उनके ऊपर कितना जुल्म किया,लेकिन उन्होंने कितनी यातनाएं सही लेकिन उन्होंने इस्लाम कुबूल नहीं किया।

उन्होंने कहा कि लखीशाह बंजारा 17 वीं शताब्दी के सबसे बड़े ट्रांसपोर्टर थे। उनके पास एक लाख से अधिक बैल थे,जिसके कारण उन्हें लखीशाह बंजारा उर्फ़ लाख़ा बंजारा कहा जाता है। वे बैलों से ट्रांसपोर्ट का काम करते थे। सन् 1675 में वे रायसीना हिल दिल्ली में कैम्प कर रहे थे। वह वही दौर था जब औरंगज़ेब द्वारा हिंदुओं को इस्लाम क़ुबूल कराने का अभियान चलाया जा रहा था। हमारा “कोरी- कोली” समाज भी उस अभियान के चपेट में आया जिनका पेशा कपड़ा बुनना था।उनके पास खेती नहीं थी, वे अपनी बुनकरी के पेशे से संतुष्ट थे। औरंज़ेब ने इस बुनकर समाज को इस्लाम स्वीकार करने या पेशा छोड़ने का विकल्प दिया।उस समय कोरी समाज को ज़बरदस्ती मुसलमान बनाया गया । जो इस्लाम स्वीकार किए जो “जुलाहा” कहलाये जिन्हें अब “अंसारी” कहा जाता है। उन्होंने कहा गोरखपुर, खलीलाबाद, मऊ, आज़मगढ़, अकबरपुर, टांडा ,वाराणसी, भदोही , मिर्ज़ापुर में ज़बरदस्ती मुसलमान बनाये गये अंसारी समाज का कपड़े का काम आज भी फल-फूल रहा है । अपने धर्म पर अडिग रहने वाले कोरी/ कोली समाज के पास न तो अपना पेशा रहा और न ही खेती।औरंगज़ेब की प्रताड़ना के कारण कोरी समाज मज़दूर बनकर रह गया।

उसी दौरान कश्मीरी पंडित कृपाराम एक जत्थे के साथ आनन्दपुर साहिब में गुरु तेग़ बहादुर से मिलने आये और अवगत कराया कि औरंगज़ेब ने हिंदुवों को इस्लाम स्वीकार करने या मौत का विकल्प दिया है, उनकी रक्षा की जाय। गुरु तेग़बहादुरजी ने उनकी रक्षा करने का आश्वासन दिये और अपने शिष्यों भाई मतीदास, भाई सतीदास और दयालदास के साथ आगरा के “ गुरु का ताल” गुरुद्वारा आ गये। औरंगज़ेब ने उन्हें शिष्यों के साथ गिरफ़्तार करवा लिया। उन्हें चाँदनी चौक दिल्ली लाया गया और इस्लाम स्वीकार करने के लिए घोर उत्पीड़न किया गया। इस्लाम स्वीकार न करने पर 9-11-1675 को भाई मतीदास को आरे से चिरवा दिया गया,वे सुखमिनी साहिब का जप करते हुए शहीद हो गये । दूसरे दिन 10-11-1675 को भाई सतीदास से कहा गया कि तुमने अपने बड़े भाई मतीदास का हस्र देख लिया है जान बचाने के लिए इस्लाम स्वीकार कर लो। भाई सतीदास ने कहा कि जान दे दूँगा परंतु धर्म नहीं छोड़ूँगा। उन्हें क़ाज़ी ने रूई में लपेट करके जिंदा जलवा दिया। भाई दयाल दास ने भी शहीदी स्वीकार की। उन्हें क़ाज़ी ने उनका हाथ- पैर बांध कर बड़े कड़ाह में पानी भरकर डलवा कर उबलवा दिया। वे भी “सत श्री अकाल” का जयकारा लगाते हुए शहीद हो गये। गुरु तेग़ बहादुर जी को लोहे के पिज़रे में बंद करके रखा गया, वे अपने शिष्यों की शहादत देखते रहे। उन्हें भी इस्लाम स्वीकार करने के लिए यातनाएँ दी गई, इस्लाम कबूल न करने पर उनका सिर कलम कर दिया गया। मुग़ल आतंक का वातावरण बनाने के लिए गुरुजी के पार्थिव शरीर का अपमान करना चाहते थे। सनातनी लाखा बंजारा ने अपने बैलों के साथ हल्ला बोल दिया और गुरु जी के शव को मुग़ल सैनिकों से छीन लिया और अपने घर को आग लगाकर उनका अंतिम संस्कार किया,जहां गुरु तेग़ बहादुर जी का सिर कलम किया गया, वहाँ अब गुरुद्वारा “शीशगंज” है और जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया, वहाँ गुरुद्वारा “ रकाबगंज” है,गुरु जी का सिर भाई जैता जी लेकर आनन्दपुर साहिब लाए और अंतिम संस्कार किया। 9वें गुरु तेगबहादुर को “हिन्द दी चादर” कहा गया। दिल्ली में विदेशी आक्रमणकारियों के नाम पर सड़कें नामित है। राज्यसभा सांसद ने सदन में कहा कि मैं माँग करता हूँ कि विदेशी आक्रमणकारी के नाम पर नामित सड़क का नाम “लखीशाह बंजारा” रोड रखा जाय।

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