हिंदी के राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने का दिन दूर नहीं
हिंदी साहित्य सम्मेलन में विशिष्टजनों को सम्मानित किया गया,पांच विद्वानों को साहित्यमहोपाध्याय सम्मान
प्रयागराज। हिंदी के राष्ट्रभाषा स्वरूप पर चिंतन करने का दिन है हिंदी दिवस। वह दिन दूर नहीं जब हिंदी स्वयं राष्ट्र की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होगी। यह बातें विशिष्ट अतिथि प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र ने हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के राजर्षि टंडन मंडपम में सोमवार को हिंदी दिवस समारोह में कहीं।समारोह में हिंदी के राष्ट्रभाषा स्वरूप और उसके भविष्य को लेकर विचार-विमर्श हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय, चित्रकूट के कुलपति प्रो. शिशिर कुमार पांडेय ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व कुलपति पद्मश्री प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ सम्मेलन के प्रधानमंत्री कुंतक मिश्र ने किया।
प्रो. शिशिर कुमार पांडेय ने कहा कि स्वाधीनता संग्राम की पृष्ठभूमि में प्रयागराज में हिंदी साहित्य सम्मेलन की नींव पड़ी। पुरुषोत्तम दास टंडन, महामना मदन मोहन मालवीय और महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य के तीन प्रमुख स्तंभ थे। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. रामकिशोर शर्मा ने किया। कार्यक्रम में हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग में हिंदी दिवस में प्रो.अभिराज राजेंद्र,सहायकमंत्री श्यामकृष्ण पांडेय, परीक्षा मंत्री प्रो. हरिनारायण दुबे, प्रचार मंत्री डॉ. सचिंद्रनाथ मिश्र व डॉ. महंत प्रसाद तिवारी मौजूद रहे।
पांच विद्वानों को साहित्यमहोपाध्याय सम्मान: समारोह में हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से आद्या प्रसाद सिंह ‘प्रदीप’ (सुल्तानपुर), प्रताप नारायण मिश्र (बाराबंकी), बृजलाल (पूर्व पुलिस महानिदेशक व वर्तमान राज्यसभा सांसद, सिद्धार्थनगर), डॉ. कृपाशंकर मिश्र (मुंबई) और डॉ. ओमप्रकाश मिश्र ‘व्यथित’ (रीवा) को साहित्यमहोपाध्याय सम्मान प्रदान किया गया।
दो पुस्तकों का विमोचन: समारोह में सम्मेलन के साहित्यमंत्री व इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. रामकिशोर शर्मा की संस्मरण आधारित पुस्तक ‘चले विदेश हिंदी की अलख जगाने’ और अभिमन्यु पांडेय की पुस्तक ‘अमृत जीवन’ का लोकार्पण किया गया।

