ब्रेकिंग न्यूज़/कारगिल विजय दिवस-26-07-020
नायक दीपचंद ने करगिल विजय दिवस के मौके पर वीर शहीदों को पुष्प अर्पित कर सलामी देते हुए दी श्रद्धांजलि
लखनऊ न्यूज़ से 17 इंडिया संवाददाता राजन द्विवेदी की रिपोर्ट-
नायक दीपचंद: जब जंग की शुरुआत हुई थी, तो हम उस वक्त बारामूला के पास थे. वहां पर ऑपरेशन रक्षक चल रहा था, वहां पर ही आतंकियों के साथ एनकाउंटर जारी था. लेकिन, हम लोगों को करगिल के लिए स्टैंड बाय पर रखा गया था..क्योंकि नीचे से जब सेना आ रही थी तो उसको वक्त था इसलिए हमें ही आगे जाने का ऑर्डर मिल गया था. जब वो लोग कैप्टन कालिया की बॉडी उठाने नहीं दे रहे थे, तब हमारी टीम पहुंची और वहां पर गोलीबारी शुरू हुई थी. शुरुआत में लगा कि सादी घुसपैठ है लेकिन फिर दहशतगर्द-पाकिस्तानी सेना साथ में आ गई।
सवाल: स्टैंड बाय के वक्त जब कुछ नहीं कर सकते थे, सिर्फ इंतजार करना था. तो सेना के जवानों का क्या मूड रहता था, किस तरह आप तैयारी कर रहे थे?
नायक दीपचंद: हमें पता था कि हम स्टैंडबाय पर हैं, तो आगे नहीं जा रहे थे. लेकिन उस वक्त हमें बैकअप तैयार करने को कहा गया, घायलों को इकट्ठा करना, उनका इलाज करना. हथियारों की तैयारी करना, क्योंकि लड़ाई ऊपर लड़ी जा रही थी उस वक्त नीचे तैयारी करना काफी जरूरी था क्योंकि फ्रंट पर काफी दिक्कतें थीं।
सवाल: जंग के वक्त सैनिक को मदद कैसे मिल पाती है? खाना, जरूरत का सामान, इलाज और बाकी सुविधाएं किस तरह पूरी होती हैं?
नायक दीपचंद: जंग के वक्त ताजा खाना मिलने का तो सवाल ही नहीं होता, हम पैक का खाना ले जाते थे. साथ में सिर्फ एक कैल्शियम की तरह की गोली ले गए थे, बादाम-काजू की चीज़ें, बिस्कुट और कुछ ऐसी चीजें जिसे हम पतीले में गर्म करके खा लें. लेकिन अगर किसी पोस्ट को जीत लेते थे, तब किसी को मौका मिलता था तो अच्छा खाना खा लेते थे. वो भी मुश्किल होता था क्योंकि जो बीच का वक्त मिलता था उसमें सिर्फ हथियारों को संभालना और साफ करना पड़ता था।
भूखा इंसान लड़ाई नहीं लड़ सकता है, लेकिन सिर्फ इतने खाने की जरूरत थी कि हम लड़ सकें. क्योंकि सामने दुश्मन था, तब खाने की जरूरत नहीं थी. हम तब कम पढ़े-लिखे थे, कुछ और चिंता नहीं थी बस हम ये कहते थे खाना बाद में दे देना, हमें बस इस सामने वाले को खत्म करना है. क्योंकि अगर आप उसे नहीं मारोगे तो वो आपको मार देगा, उस वक्त किसे भूख लगेगी.
